इंस्टीट्यूट की लीज़ रद्द करने का भेजा नोटिस, लद्दाख की शान रहे संस्थान पर क्या चलेगा बुलडोज़र भी
लद्दाख के पर्यावरणविद् और क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक, जिन्हें दुनिया भर में आइस स्तूपा और उनके अनूठे इनोवेशन के लिए जाना जाता है, आज मोदी सरकार के निशाने पर हैं। जिस शख्स ने शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण का नया मॉडल दुनिया को दिया, उसकी यूनिवर्सिटी – हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव लर्निंग (HIAL) – की भूमि लीज़ 21 अगस्त 2025 को सरकार ने रद्द कर दी।
देश के हीरो से ‘सज़ा’ तक का सफर
सोनम वांगचुक ने सरकार के नोटिस को दिखाते हुए कहा कि “देखो, यही है मेरा असली पद्मश्री।”
यह तंज दरअसल उस रवैये पर था, जिसमें सरकार ने 1076 कनाल भूमि पर बनी इस अनूठी यूनिवर्सिटी को अचानक अवैध ठहराकर जमीन वापस लेने का आदेश दे दिया। सोनम कहते हैं कि लोग कहते रहते थे कि मुझे पद्मश्री या भरत रत्न मिलना चाहिए। देश मुझे यह ‘पद्मश्री’ दे रहा है।
यूनिवर्सिटी क्यों खटक रही है?
- इस संस्थान में शिक्षा, विज्ञान, पर्यावरण और लद्दाख की संस्कृति पर गहरे प्रयोग हो रहे थे।
- 450 से अधिक छात्र यहां से डिग्री प्राप्त कर चुके हैं।
- आइस स्तूपा, सोलर इनोवेशन और टिकाऊ ऊर्जा पर अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रयोग यहां चल रहे थे।
- लेकिन जैसे ही सोनम वांगचुक ने लद्दाख को छठी अनुसूची (Sixth Schedule) में शामिल करने और चरवाहों की ज़मीन बचाने की मांग की, सरकार ने रुख बदल दिया।
विरोध क्यों बढ़ रहा है?
स्थानीय सांसद हनीफा ने भी संसद और मीडिया में साफ शब्दों में कहा –
“यह शिक्षा और ज्ञान के खिलाफ मोदी सरकार का अभियान है।”
HIAL की CEO गीतांजलि ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पूरी क्रोनोलॉजी बताई—
- 2018 में जमीन अलॉट हुई।
- लगातार सरकार को लीज़ एग्रीमेंट साइन करने के लिए चिट्ठियां भेजी गईं।
- 2020, 2021 और 2023 में सरकार ने जवाब दिया कि पॉलिसी बन रही है और निर्माण की अनुमति दी।
- लेकिन अचानक अगस्त 2025 में आदेश आया कि लीज़ कैंसल।
गीतांजलि ने साफ आरोप लगाया कि जैसे ही वांगचुक ने छठी अनुसूची की मांग उठाई, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने उन्हें धमकाया और कहा – “अब लीज़ पेंडिंग है।”
सरकार की मंशा पर सवाल
सवाल उठता है कि जब सरकार खुद HIAL को पहले प्रोत्साहित करती रही, मंत्री ट्वीट कर गर्व जताते रहे, तो अचानक क्या हुआ?
क्या वजह सिर्फ यह है कि सोनम वांगचुक लद्दाख को कॉरपोरेट हितों से बचाने और स्थानीय स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं?
बड़ा सवाल
जिस देश के प्रधानमंत्री अपनी डिग्री दिखाने से बचते हैं, उसी देश में एक ऐसी यूनिवर्सिटी की डिग्री और प्रयोगशाला को क्यों मिटाया जा रहा है, जिसने वैश्विक स्तर पर भारत का नाम रोशन किया?
वांगचुक का कहना है – “एक यूनिवर्सिटी को बनाने में सालों लगते हैं, लेकिन मोदी सरकार को उसे मिटाने में बस एक ऑर्डर चाहिए।”