सुप्रीम कोर्ट की इकलौती महिला जज ने न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की नियुक्ति पर उठाया सवाल
भारत की न्यायपालिका में नियुक्तियों को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति और कोलेजियम की सिफारिशें लंबे समय से आलोचना के घेरे में रही हैं। ताज़ा मामला सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की उस सिफारिश का है जिसमें पटना हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस विपुल मनुभाई पंचोली को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत करने की अनुशंसा की गई।
इस सिफारिश पर सुप्रीम कोर्ट की एकमात्र महिला जज बी.वी. नागरत्ना ने डिसेंट नोट दर्ज कर कड़ी आपत्ति जताई है।
कौन हैं जस्टिस विपुल पंचोली?
- गुजरात में जन्मे जस्टिस पंचोली 2014 से 2023 तक गुजरात हाई कोर्ट में न्यायाधीश रहे।
- 2023 में उन्हें ट्रांसफर कर पटना हाई कोर्ट भेजा गया।
- मई 2025 में उन्हें पटना हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की गई, जिसे केंद्र ने जुलाई में मंज़ूरी दे दी।
- अब कोलेजियम ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत करने की सिफारिश कर दी है।
- यदि यह नियुक्ति होती है तो अक्टूबर 2031 में वे भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बन सकते हैं और लगभग डेढ़ वर्ष का कार्यकाल पाएंगे।
जस्टिस नागरत्ना की आपत्तियां
जस्टिस नागरत्ना ने अपने डिसेंट नोट में कई गंभीर बिंदु उठाए:
- वरिष्ठता की अनदेखी – जस्टिस पंचोली वरिष्ठता सूची में 97वें स्थान पर हैं। उनसे ऊपर कई वरिष्ठ और योग्य जज मौजूद हैं जिन्हें प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी।
- क्षेत्रीय असंतुलन – सुप्रीम कोर्ट में पहले से गुजरात से दो जज (जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस एन.बी. अंजारिया) मौजूद हैं। अब जस्टिस पंचोली की नियुक्ति से गुजरात का प्रतिनिधित्व और बढ़ेगा जबकि कई बड़े राज्यों की हिस्सेदारी कम हो जाएगी।
- ट्रांसफर पर सवाल – 2023 में गुजरात से पटना भेजे जाने का निर्णय एक साधारण प्रशासनिक कदम नहीं था। नागरत्ना ने उस गोपनीय बैठक की कार्यवाही की प्रतियां पुनर्विचार हेतु मांगी हैं।
- न्यायपालिका की साख – उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह के निर्णय से न्यायपालिका की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर दीर्घकालिक असर पड़ेगा।
उन्होंने यहां तक सुझाव दिया कि उनका डिसेंट नोट सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाए ताकि नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी रहे।
वरिष्ठ वकीलों और नागरिक समाज की प्रतिक्रिया
- वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंग ने कहा कि जस्टिस पंचोली से पहले कम से कम तीन वरिष्ठ महिला जज – सुनिता अग्रवाल, रेवती मोहती डेरे और लीसा गिल – को तरजीह मिलनी चाहिए थी।
- वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने इस आपत्ति का समर्थन किया और कहा कि यह फैसला न्याय प्रशासन और कोलेजियम प्रणाली की साख दोनों के लिए नुकसानदेह होगा।
तुरंत ही नियुक्ति भी
आज ही केंद्र सरकार ने आश्चर्यजनक रूप से तेज़ी दिखाते हुए जस्टिस विपुल पंचोली की नियुक्ति अधिसूचित कर दी है। इस जल्दबाज़ी ने यह सवाल और गहरा दिया है कि क्या सरकार और कोलेजियम में पारदर्शिता और संतुलन की जगह राजनीतिक या अन्य विचार हावी हैं।
कोलेजियम व्यवस्था पर पुराने विवाद
भारत में कोलेजियम प्रणाली के तहत सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति पांच वरिष्ठतम जजों की सिफारिश से होती है।
- आलोचकों का कहना है कि इसमें पारदर्शिता का अभाव है, जनता को कारण नहीं बताए जाते और यह प्रणाली ‘जजों द्वारा जजों के लिए’ बन गई है।
- कई बार राजनीतिक दबाव, भाई-भतीजावाद और क्षेत्रीय असंतुलन के आरोप लगते रहे हैं।
- हाल ही में चीफ जस्टिस गवई के रिश्तेदार की बॉम्बे हाई कोर्ट में नियुक्ति की सिफारिश ने इन आशंकाओं को और मज़बूत किया है।
नियुक्तियों को लेकर पहले भी उठे विवाद
जस्टिस विपुल पंचोली की नियुक्ति पर उठा विवाद कोई पहला मामला नहीं है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया पहले भी कई बार विवादों में रही है।
1. जस्टिस के.एम. जोसेफ (2018)
2018 में जस्टिस के.एम. जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत करने की कोलेजियम सिफारिश पर केंद्र सरकार ने बार-बार आपत्ति जताई और फाइल लौटा दी। तब यह आरोप लगा कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन को निरस्त करने वाले उनके ऐतिहासिक फैसले के कारण केंद्र सरकार उन्हें रोक रही थी। बाद में भारी दबाव के बाद उनकी नियुक्ति हुई।
2. जस्टिस अकील कुरैशी (2019–2021)
गुजरात हाई कोर्ट के वरिष्ठ जज अकील कुरैशी की नियुक्ति को लेकर भी केंद्र सरकार और कोलेजियम में टकराव हुआ। केंद्र लंबे समय तक उनकी फाइल रोकता रहा और अंततः उन्हें त्रिपुरा हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया। इस दौरान बार-बार यह सवाल उठा कि क्या सरकार राजनीतिक आधार पर नियुक्तियों को प्रभावित कर रही है।
3. जस्टिस एस. मुरलीधर (2020)
दिल्ली दंगों के दौरान नफ़रत भरे भाषण देने वाले नेताओं पर एफआईआर दर्ज करने के आदेश देने के बाद अचानक रातोंरात जस्टिस एस. मुरलीधर का ट्रांसफर किया गया। यह कदम न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधे हमले के तौर पर देखा गया।
4. जस्टिस पी.डी. दिनakaran और अन्य मामले
कई जजों की नियुक्तियों पर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और पक्षपात के आरोप भी लगते रहे हैं। यहां तक कि कुछ जजों पर महाभियोग की प्रक्रिया भी शुरू करनी पड़ी।
बड़ा सवाल: क्या कोलेजियम व्यवस्था पारदर्शी है?
इन विवादों से यह साफ है कि कोलेजियम व्यवस्था, जिसे 1993 के “सेकंड जजेज केस” के बाद लागू किया गया था, अब गंभीर सवालों के घेरे में है।
- इसमें पारदर्शिता की कमी है, कारण सार्वजनिक नहीं किए जाते।
- राजनीतिक दबाव और लॉबिंग के आरोप बार-बार लगते हैं।
- क्षेत्रीय और लिंग संतुलन की अनदेखी होती है।
- और अब वरिष्ठता की अनदेखी का मुद्दा भी सामने आ गया है।
निष्कर्ष
लोकतंत्र के तीन स्तंभ – कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया – पहले ही गंभीर सवालों में घिरे हुए हैं। न्यायपालिका अब तक भरोसे का अंतिम स्तंभ मानी जाती रही है। लेकिन अगर नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और संतुलन न रहा, तो न्यायपालिका की निष्पक्षता पर भी प्रश्नचिह्न लग जाएगा और यह भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहद ख़तरनाक संकेत होगा।
जस्टिस नागरत्ना का डिसेंट इस व्यापक बहस को और गहरा करता है। सवाल सिर्फ एक नियुक्ति का नहीं है बल्कि पूरी न्यायपालिका की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और स्वतंत्रता का है।