August 29, 2025 6:57 pm
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संघ आज़ादी के समय नहीं चाहता था हरेक को मिले वोट का अधिकार

आरएसएस की विचारधारा शुरू से ही सार्वभौमिक मताधिकार के खिलाफ रही है। बिहार में चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया से 2 करोड़ वोटरों के अधिकार खतरे में हैं। क्या लोकतंत्र पर नया हमला हो रहा है?

आज वही अधिकार बिहार में चुनाव आयोग की प्रक्रिया और आरएसएस की विचारधारा के साये में संकट में

संविधान सभा में डॉ. अंबेडकर और नेहरू ने जिस सार्वभौमिक मताधिकार (Universal Adult Franchise) की रक्षा की थी, आज वही अधिकार बिहार में चुनाव आयोग की प्रक्रिया और आरएसएस की विचारधारा के साये में संकटग्रस्त है।

भारतीय लोकतंत्र की नींव सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर टिकी है—एक व्यक्ति, एक वोट। संविधान सभा में डॉ. भीमराव अंबेडकर और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसे मजबूती से रखा और हर वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार सुनिश्चित किया। लेकिन, आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) की सोच शुरू से ही इसके खिलाफ रही है।

आरएसएस और मताधिकार का विरोध

1952 में जब भारत में पहला आम चुनाव हुआ, तब आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गेनाइज़र ने सार्वभौमिक मताधिकार को देश के लिए “विनाशकारी” बताया। उनका तर्क था कि अशिक्षित और गरीब वर्ग राजनीति समझने में सक्षम नहीं है, इसलिए उन्हें मतदान का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। आरएसएस का यह दृष्टिकोण भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद के खिलाफ था।

बिहार में SIR और नया संकट

आज यही मानसिकता बिहार में चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया में दिखाई देती है। चुनाव से कुछ महीने पहले ही आयोग ने मतदाता सूची की इस “विशेष संशोधन प्रक्रिया” की शुरुआत की, जिसमें 11 दस्तावेजों की अनिवार्यता जैसी कठोर शर्तें रखी गईं। आलोचकों का कहना है कि इससे गरीब, मज़दूर, प्रवासी, भिखारी, सेक्स वर्कर और उपेक्षित समुदायों के लाखों लोग मतदाता सूची से बाहर हो जाएंगे।
अनुमान है कि करीब 2 करोड़ वोटर प्रभावित हो सकते हैं।

विपक्ष का आंदोलन और सवाल

कांग्रेस नेता राहुल गांधी और INDIA गठबंधन ने इसे लोकतंत्र पर हमला बताया है। उन्होंने चुनाव आयोग से डेटा साझा करने की मांग की, लेकिन आयोग ने कांग्रेस को इलेक्ट्रॉनिक डेटा देने से इनकार कर दिया, जबकि बीजेपी नेताओं को यह डेटा कुछ ही दिनों में उपलब्ध करा दिया गया। इससे चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठे हैं।

कांग्रेस ने इसे “वोट चोरी” की साजिश बताया है। राहुल गांधी की पहल पर मतदान अधिकार यात्रा शुरू हो रही है, जिसमें जनता से अपील की जाएगी कि लोकतंत्र को बचाने के लिए हर नागरिक की आवाज़ जुड़नी चाहिए।

लोकतंत्र बनाम हिंदुत्व राजनीति

यह पूरा विवाद केवल तकनीकी प्रक्रिया का मुद्दा नहीं है, बल्कि लोकतंत्र और आरएसएस की विचारधारा के टकराव का प्रतीक है।

  • एक तरफ संविधान की भावना है—सभी नागरिकों को समान मतदान अधिकार।
  • दूसरी तरफ आरएसएस की सोच है—सिर्फ संपत्ति और शिक्षा वाले “योग्य” लोग ही वोट दें।

यही कारण है कि बिहार का SIR विवाद केवल स्थानीय नहीं बल्कि लोकतंत्र और मताधिकार की सार्वभौमिकता पर राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया है।

निष्कर्ष

भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब संविधान की मूल भावना—एक व्यक्ति, एक वोट—की रक्षा हो। आरएसएस की विचारधारा और चुनाव आयोग का रवैया अगर गरीब, उपेक्षित और वंचित समुदायों को मताधिकार से वंचित करता है, तो यह सीधे संविधान और लोकतंत्र पर हमला है। बिहार की यह लड़ाई दरअसल पूरे देश के लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई है।

राम पुनियानी

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