संयुक्त राष्ट्र ने किया ऐलान फिर भी भूख से मर रहे बच्चों पर दुनिया खामोश
संयुक्त राष्ट्र ने आखिरकार घोषणा कर दी है कि गाज़ा अब आधिकारिक तौर पर अकाल (Famine) की स्थिति में है। यह कोई अचानक या चौंकाने वाली घटना नहीं है, बल्कि वह हकीकत है जिसे पूरी दुनिया महीनों से अपनी आंखों के सामने देख रही है—भूख से तड़पते और मरते बच्चे, महिलाएं और आम लोग।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, गाज़ा में सिर्फ भूख और कुपोषण के कारण अब तक 271 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, जिनमें से 112 से अधिक बच्चे हैं। यह आंकड़ा केवल मौतों का नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक शर्मनाक गवाही है।
इस्राइल की नीतियां और भूख को हथियार बनाना
जहाँ पूरी दुनिया इन मौतों पर चुप है, वहीं इस्राइल अपने खूनी मनसूबे को खुलेआम अंजाम दे रहा है। इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वार क्रिमिनल (War Criminal) कहा जा रहा है, बेशर्मी से यह दावा करता है कि उसे गाज़ा में भूख से मरते बच्चे दिखाई नहीं देते।
तस्वीरें और वीडियो गवाही देते हैं कि हजारों लोग अनाज और पानी के लिए कतारों में खड़े हैं, और इसी दौरान इस्राइली और अमेरिकी ताकतों की गोलियों से इनकी हत्या की जा रही है।
अमेरिका और पश्चिमी देशों की भूमिका
इस पूरे नरसंहार में केवल इस्राइल ही नहीं, बल्कि अमेरिका और पूरा पश्चिमी जगत उसके साथ खड़ा है। भूख को जंग का हथियार (Weapon of War) बनाकर एक पूरी पीढ़ी को खत्म करने की यह साजिश, दुनिया की सबसे बड़ी ताक़तों की सरपरस्ती में चल रही है।
बाहर गोदामों में अनाज सड़ रहा है, पानी बर्बाद हो रहा है, लेकिन गाज़ा के अंदर लोगों तक मदद नहीं पहुँचने दी जा रही। पाँच से अधिक महीने से जारी यह घेराबंदी सिर्फ और सिर्फ फिलिस्तीनियों को भूख से मिटाने की रणनीति का हिस्सा है।
ऐतिहासिक संदर्भ: भूख को हथियार के तौर पर इस्तेमाल
गाज़ा की स्थिति मानव इतिहास में नई नहीं है। भूख को जंग के औजार के रूप में पहले भी इस्तेमाल किया गया है।
- बोस्निया (1990s): बोस्नियाई युद्ध के दौरान सरायेवो की नाकेबंदी में हजारों लोग भूख और कुपोषण से मारे गए।
- यमन (2015–अब तक): सऊदी अरब और उसके सहयोगियों द्वारा लगाई गई नाकेबंदी ने लाखों बच्चों को भूख और कुपोषण का शिकार बनाया।
- बंगाल का अकाल (1943): औपनिवेशिक ब्रिटिश नीतियों और जबरन खाद्य आपूर्ति रोकने से लाखों लोग भूख से मारे गए।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि भूख को महज़ मानवीय विफलता नहीं, बल्कि राजनीतिक हिंसा के तौर पर गढ़ा जाता है। गाज़ा उसी सिलसिले की नवीनतम कड़ी है।
अंतरराष्ट्रीय कानून और युद्ध अपराध
संयुक्त राष्ट्र का Rome Statute और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून स्पष्ट रूप से कहते हैं कि भोजन और पानी को रोकना युद्ध अपराध (War Crime) और मानवता के खिलाफ अपराध (Crime Against Humanity) है।
फिर भी, इस्राइल के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही। यही वजह है कि सवाल और गहरे हो जाते हैं—
- क्या पश्चिमी दुनिया की चुप्पी इस अपराध की साझेदार नहीं है?
- क्या भूख से बच्चों को मारना किसी भी तरह से “आत्मरक्षा” कहा जा सकता है?
- और क्या भूख को एक जेनोसाइड (Genocide) के औज़ार के रूप में इस्तेमाल करने की परिभाषा अब गाज़ा में पूरी नहीं हो रही?
सवाल मानवता से
आज का सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब तक अमेरिका की सरपरस्ती में इस्राइल यह नरसंहार जारी रखेगा? क्या भूख से मरना किसी इंसान का क़िस्मत है या यह दुनिया की सबसे बड़ी वार क्राइम की परिभाषा है?
भूख को जेनोसाइड (Genocide) का हिस्सा बनाकर बच्चों को मरने के लिए छोड़ देना केवल गाज़ा की त्रासदी नहीं है, बल्कि पूरी मानवता की हार है।