दिल्ली हाई कोर्ट ने PM की डिग्री न दिखाने का फैसला दे सनसनी कम की या बढ़ाई!
दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री को सार्वजनिक करने से इनकार करते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि इस विवाद में “सार्वजनिक हित से ज़्यादा सेंसेशनलिज़्म है।” यह आदेश उस समय आया है जब देश में पारदर्शिता और जवाबदेही की बहस लगातार तेज़ है।
डिग्री विवाद की पृष्ठभूमि
2016 में केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने दिल्ली विश्वविद्यालय को आदेश दिया था कि नरेंद्र मोदी की डिग्री सार्वजनिक की जाए। इसके बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके मोदी की बीए और एमए दोनों डिग्रियाँ दिखाई थीं। लेकिन इन डिग्रियों को लेकर कई सवाल उठे—
- “Entire Political Science” नामक विषय पर संदेह,
- डिग्री में इस्तेमाल हुए फॉन्ट और डिज़ाइन,
- और पढ़ाई के वर्ष से जुड़े विरोधाभास।
हाईकोर्ट का तर्क
दिल्ली हाईकोर्ट ने अब कहा है—
- प्रधानमंत्री की डिग्री में कोई “सार्वजनिक हित” नहीं है।
- इसे उजागर करना केवल सेंसेशनलिज़्म को बढ़ावा देगा।
- CIC के आदेश को लागू करने की बाध्यता नहीं है।
- न केवल मोदी, बल्कि स्मृति ईरानी जैसी अन्य नेताओं की शैक्षणिक योग्यता को भी सार्वजनिक करने की आवश्यकता नहीं।
पारदर्शिता बनाम गोपनीयता
यहाँ बड़ा सवाल यह है कि जब आम जनता से बार-बार दस्तावेज़ मांगे जाते हैं, तो सत्ता में बैठे नेताओं पर वही कसौटी क्यों लागू नहीं होती?
- बिहार और असम जैसे राज्यों में वोटर लिस्ट सुधार अभियान के तहत नागरिकों से जन्म प्रमाणपत्र, माता-पिता के दस्तावेज़ और पहचान के कई प्रमाणपत्र मांगे जा रहे हैं।
- वहीं प्रधानमंत्री जैसे शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की डिग्री को अदालत ने “सार्वजनिक हित से अप्रासंगिक” करार दिया।
मोदी के पुराने बयान और विरोधाभास
प्रधानमंत्री मोदी स्वयं कई बार कह चुके हैं कि उन्होंने गांव में स्कूली शिक्षा पाई और 17 साल की उम्र में घर छोड़ दिया। बाद में उन्होंने इंटरव्यू में कहा कि उन्होंने Entire Political Science में एमए किया। यही बयानबाज़ी इस विवाद को और उलझाती है।
अंतरराष्ट्रीय तुलना: लोकतंत्र और शैक्षणिक पारदर्शिता
दुनिया के कई लोकतंत्रों में नेताओं की शिक्षा और व्यक्तिगत जीवन सार्वजनिक जानकारी का हिस्सा होती है।
- अमेरिका: राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों की शैक्षणिक जानकारी विश्वविद्यालय रिकॉर्ड और आधिकारिक प्रोफाइल में सार्वजनिक होती है। बराक ओबामा से लेकर जो बाइडेन तक की डिग्रियाँ आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध हैं।
- ब्रिटेन: प्रधानमंत्री की शैक्षणिक और पेशेवर पृष्ठभूमि संसद और मीडिया रिकॉर्ड में दर्ज होती है। बोरिस जॉनसन, ऋषि सुनक या टोनी ब्लेयर की पढ़ाई की जानकारी सार्वजनिक है।
- यूरोप: जर्मनी की पूर्व चांसलर एंजेला मर्केल की PhD in Quantum Chemistry से जुड़ा पूरा शैक्षणिक विवरण आम जनता के लिए खुला है।
- भारत: यहाँ स्थिति उलट है। नेताओं की शिक्षा या तो चुनाव हलफनामे तक सीमित रहती है या फिर विवाद का विषय बन जाती है।
यानी भारत में सत्ता की राजनीति पारदर्शिता की बजाय आस्था पर अधिक टिकी हुई दिखाई देती है।
राजनीतिक अर्थ
- समर्थकों के लिए: मोदी की डिग्री अप्रासंगिक है, क्योंकि उनकी राजनीतिक यात्रा और कामकाज ही उनकी पहचान है।
- विरोधियों के लिए: यह फैसला सत्ता की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गहरे सवाल खड़ा करता है। जब सरकार जनता से कागज़ दिखाओ अभियान चला रही है, तब नेताओं को छूट क्यों?
निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट का यह आदेश केवल एक डिग्री विवाद को खत्म करने वाला फैसला नहीं है, बल्कि यह भारत की राजनीति में पारदर्शिता बनाम गोपनीयता की खींचतान को उजागर करता है। सवाल यह है कि—
- क्या जनता के लिए नेताओं की शैक्षणिक पृष्ठभूमि जानना गैर-ज़रूरी है?
- या यह केवल उस सत्ता संरचना की मजबूती है जहाँ नेता जनता से जवाबदेही नहीं बल्कि आस्था की उम्मीद रखते हैं?